सूरज का रथ लालिमा ले कर ,
निकल पड़ा था क्षितिज की ओर !
विशाल समुद्र के सपाट हृदय पर ,
उठ रहा था लहरों का शोर !
कलरव करते पक्षी भी अब,
ढूंढ रहे थे रैन बसेरा !
वहीँ दूर एक खड़ी थी किश्ती ,
जाने को अब घर की ओर !
सफ़ेद चमकती रेत पर बैठी ,
सोच रही थी मैं एक बात !
क्यूँ न आज कुछ पंक्तियाँ लिख कर ,
कर दोन उनको इस शाम के नाम !
मेरे जीवन की जब भी आए ,
ऐसी शाम सुहानी हो !
जो बीती ,जैसी भी बीती ,
आगे सुख भरी कहानी हो !
जब भी आए डोली मेरी ,
इस दुनिया से दूर जाने को !
विदा करना तुम मुझे सजा कर ,
जैसे दुल्हन नई नवेली हो !
Saturday, August 29, 2009
एक शाम के नाम
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Tuesday, August 18, 2009
जीवन यात्रा
जीवन एक यात्रा है ,जो शुरू होती है
बचपन की खुली ,चौडी ,साफ़ सडकों से !
जिनसे बचपन भागता सा गुज़र जाता है !
फ़िर नज़र आती हैं वही सड़कें
गली के रूप में !
जहाँ धीमी हो जाती है जीवन की रफ़्तार !
कुछ समय बाद शुरू होती हैं
पग डंडियाँ - छोटी ,बड़ी,लम्बी,पतली
यहीं से शुरू होता है ,आँख मिचोली का खेल !
जो इन पग डंडियों में भटक गया,
वही जीवनधारा में उलझ गया !
जिसने अपना रास्ता खोज लिया
समझो वही जीवन में जीत गया !
मैं भी भटक गई हूँ इन पग डंडियों में !
वहाँ आ खड़ी हूँ ,जहाँ से हर रास्ता
अंधेरे में खोया सा लगता है !
भटकने के डर से भयभीत
और सही मार्गदर्शन की उम्मीद ले खड़ी हूँ !
यात्रा का अंत कब और कहाँ होगा
मैं नहीं जानती !
मगर इतना जानती हूँ
कि---
जीवन यात्रा बहुत छोटी है !
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Saturday, June 6, 2009
अपने शहर में
नसीब-ए-दर्द किसीसे ,हम कहना नहीं चाहते
अब अपने शहर में दिल-ए-सोज़ ,हम रहना नहीं चाहते !
हमने देखी है वफ़ा की आड़ में,बेवफाई उनकी
इस अफसाने को अब ,हम कहना नहीं चाहते
अब अपने शहर में दिल-ए-सोज़ ,हम रहना नहीं चाहते !
न समझें जज़्बात वो हमारे ,तो कोई बात नहीं
यूँ बेवजह हम भी ,उन्हें समझाना नहीं चाहते
अब अपने शहर में दिल-ए-सोज़ ,हम रहना नहीं चाहते !
भरते थे दम वो सरे महफ़िल ,जाँ निसारी का
ज़ख्म-ए-जिगर उनके दिए ,हम दिखाना नहीं चाहते
अब अपने शहर में दिल-ए-सोज़ ,हम रहना नहीं चाहते !
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Saturday, April 25, 2009
तुम
तुम्हारी मुस्कराहट मेरे दिल को चुरा ले जाती है !
मैं कुछ कहना भी चाहूँ तो मुझे वो रोक लेती है !
सर्दियों में ओस की बूँद से अगर खेलना चाहूँ ,
न जाने क्यूँ तुम्हारी तस्वीर उभर के आती है !
पास अपनी हरदम महसूस होता है एक साया ,
तुम्हारी हर इक अदा नज़र उसमें भी आती है !
मैं भूले से अगर आँखें कभी बंद कर लूँ ,
ख्यालों में तुम्हारा चेहरा ही मन को भाता है !
कभी भूले से मन मेरा भटक भी जाए तो क्या ,
लगता है कि वो तुमसे मिल कर मेरे पास आता है !
मैं भूल जाऊं तुम्हें और न करूँ कभी याद ,
मेरा दिल हर वक्त अब यही चाहता है !
मगर -
मेरे चाहने या न चाहने से क्या होता है ,
वही होता है जो मंजूरे खुदा होता है !
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Saturday, March 21, 2009
वो शाम
वो एक हसीं शाम थी
शायद वो उनके नाम थी
हर नजारे में उनका चेहरा था
वो तो गज़ब की शाम थी
उस राह से हम गुज़रे ही थे
अचानक नज़र वो आ गए
उनसे निगाहें क्या मिली
उनके चेहरे का रंग बदल गया
चेहरा सफ़ेद से सुर्ख हुआ
सुर्ख रंग शर्म में बदल गया
करीब से वो गुजरे ही थे
धीरे से हम कुछ कह गए
करके नज़रंदाज़ बातों को
सर को झुका वो चल दिए
एक बार फिर उसी राह पर
अचानक नज़र वो आ गए
जैसे ही हमने कुछ कहा
धीमे से वो कुछ कह गए
उनके लबों पे जो लफ्ज़ थे
वो लफ्ज़ काबिलेगौर थे
माना मंजिल हमारी एक थी
पर रास्ते हमारे और थे !
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Wednesday, October 8, 2008
वह पीला गुलाब
फ़िर आसमान से सूरज उतरा
धरती पर लालिमा छाई !
पंछी उड़ चले नभ की ओर
मैंने भी घर की खिड़की खोली !
बाहर छोटी सी बगिया थी !
मंद,मंद हवा के झोंके
बुला रहे थे अपनी ओर !
अनायास मैं निकल पड़ी फ़िर
हरी घास थी जैसे मखमल
हर पौधे की हिलती डाली
लगता मुझको बुला रही थी !
जैसे मैं पहुँची एक पौधे के पास
देखा सुंदर खिला गुलाब !
सोने जैसा पीला रंग था !
देखा उसको,कुछ याद आया
एक पीला गुलाब वहां भी था
जो छोटा सा उपहार स्वरुप
किसी का आँगन महका रहा था !
न जाने अब कहाँ है वो ?
सजा रहा है उसका आँगन
या फ़िर सूख कर बिखर गया है ?
उसकी सुगंध में मेरी यादें
अब भी उसको आती होंगी ?
एक दिन उसने कहा था मुझसे
अब भी खुशबू आती है उसमें
अब भी वैसा ताजापन है !
रखूँगा इसको अपने दिल में
इसमें तेरा अपनापन है !
न जाने अब कहाँ है वो ?
सजा कर रखा है कोने में
या फ़िर तोड़ कर फैंक दिया है ?
तभी टहनी का काँटा चुभ कर
मुझे वर्तमान में ले आया !
और मैं लौट पड़ी फ़िर वापिस
भरी मन से घर की ओर !
दिल ने चाहा पंछी बनकर
उड़ कर पहुंचूं उसके पास !
और फ़िर उसका हाथ पकड़ कर
उससे पूछूं सिर्फ़ एक बात !
कहाँ है पीला खिला गुलाब ?
क्या अब भी है उसकी वैसी खुशबू ?
क्या अब भी उसमें वही महक है ?
क्या अब भी वैसा ताजापन है ?
क्या मेरी याद दिलाता है वो ?
फ़िर ढूंदेंगी उसको मेरी नज़रें
फ़िर पूछेंगी उससे यही सवाल !
यहाँ नहीं है,कहाँ गया वो ?
क्या तुमने वह फैंक दिया है ?
फैंक आए हो उसको पीछे
ऐसा मुझसे कभी न कहना !
वरना मैं समझूंगी तुमने
दिल से मुझको फैंक दिया है !
तभी नज़र पड़ेगी कोने पर
कागज़ में लिपटा खिला गुलाब
मानो मुझसे कहेगा हंस कर !
क्या सोचा था,तुम कर पाओगी
खुशबू को फूलों से दूर ?
दिल में उसके सदा रहोगी
चाहे हो जाओ जग से दूर !
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Wednesday, October 08, 2008
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Monday, September 8, 2008
कुछ सवालात
गुज़र चुकी जिंदगी की रातें
क्यूँ न सुबह का इंतज़ार करें !
बहुत हो चुकी तकरार की बातें
क्यूँ न प्यार का इज़हार करें !
मौत तो मिल जायेगी बिन मांगे
क्यूँ न जिंदगी से दो बात करें !
ढूंढ रहे हैं हम,कहाँ खो गए तुम
क्यूँ न हम तुमसे मुलाक़ात करें !
बहुत थक चुके,अब सोचते हैं हम
क्यूँ न तुमसे कुछ सवालात करें !
कहाँ से चले थे,कहाँ आ गए हम
क्यूँ न नए सफर की शुरुआत करें !
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Monday, September 08, 2008
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Monday, August 18, 2008
तुम्हारा ख्याल
वो महकता हुआ सा तुम्हारा ख्याल
आज मुझे क्यूँ आ गया !
जागते में तुम्हारा सुनहरा सा ख्वाब
दिल को क्यूँ बहला गया !
वो महकता हुआ सा तुम्हारा ख्याल !!
तुम्हे तो भुला ही चुकी थी मैं कब का
अचानक तुम्हारा चेहरा
याद मुझे क्यूँ आ गया !
वो महकता हुआ सा तुम्हारा ख्याल !!
हवा से भी पूछा तुम्हारा हाल
फिजां से भी पूछा ये ही सवाल
मगर हर तरफ़ से मायूस सा
जवाब मुझे क्यूँ आ गया !
वो महकता हुआ सा तुम्हारा ख्याल !!
इस उम्मीद पर गुजरी मेरी शाम
कभी तो नज़र आए ईद का चाँद
मगर चाँद को देखते ही मुझे
तुम्हारा ख्याल आ गया !
वो महकता हुआ सा तुम्हारा ख्याल
आज मुझे क्यूँ आ गया !
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Monday, August 18, 2008
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Thursday, August 7, 2008
प्यार भरा एक टुकडा
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Friday, August 1, 2008
दगा
दोस्त बन कर तुमने
अपनी ही दोस्ती को दगा दिया ,
तुमसे तो दुश्मन भले
जो दुश्मनी तो निभाते हैं !
गंगा की तरह पाक
समझा था तुम्हे हमने !
करके मैला दोस्ती को ,तुमने
गंगाजल को नापाक किया !
कहते थे बड़े नाज़ से हम
हीरा है दोस्ती अपनी !
कमबख्त तब कहाँ जानते थे
हीरा भी कभी ज़हर बन जाता है !
इसे वक्त का ही तकाजा कहें
जो कभी हम पर लुटाते थे अपनी जान !
आज वो हर हाल में
हमारी जान के दुश्मन बने जाते हैं !
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Friday, August 01, 2008
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