

खुशियाँ मेरे दरवाज़े तक आयी ,
मगर दहलीज़ लाँघ न पायी !
हाथ बडा कर उन्हे समेटना चाहा
चाहते हुए भी समेत न पायी
जीवन कि खुशियों को करने हासिल ,
कुछ दूर तक दौड़ना चाहा !
पर वक्त की रफ़्तार के संग ,
ज्यादा दूर तक दौड़ न पायी !
जीवन की शाम ढलने को है ,
मैंने खुशियों के चिराग जलाने चाहे !
दर्द की हवाओं से चिराग बुझने लगे ,
में गम के अँधेरे मिटा न पायी !
Tuesday, February 12, 2008
खुशियाँ
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शिवानी
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Tuesday, October 30, 2007
हमें अच्छा नहीं लगता
जब हम उस बाग़ से गुज़रे!
और उस पेड़ के बडे पत्ते
हमारी राह में बिखरे !
मगर अब हम वहाँ दोबारा
कभी जाना नहीं चाहते !
भूले से भी वहाँ जाना
हमें अच्छा नहीं लगता !
वो महफिल याद है हमको
हमें महफिल-ए-जान कह देना !
हमारी हर बात पर सबका
वो हँसना खिलखिला देना !
मगर अब हम वहाँ दोबारा
कभी जाना नहीं चाहते !
किसी की बात पर हँसना
हमें अच्छा नहीं लगता !
गुलाबों के बडे गुलदस्ते
हमारी जान थे कल तक !
वो पीला रंग ,महक उनकी
हमारी जान थे कल तक !
मगर अफ़सोस ये रंगत
उदासी का सबब है अब !
गुलाबों का कहीं भी ज़िक्र
हमें अच्छा नहीं लगता !
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Tuesday, October 9, 2007
मुद्दत
वो चांद वहाँ पर कैसा है ?
मुद्दत हो गयी देखे उसे
क्या हाल वहाँ पर उसका है ?
क्या अब भी उसकी मीठी बातें
मीठा रस कानों में घोलती हैं ?
क्या अब भी उसकी खामोश आंखें
चुप रह कर भी सब बोलती हैं ?
क्या अब भी मेरी आशाओं का चेहरा
उसके चहरे से मिलता है ?
क्या अब भी उसको बेबात पे ग़ुस्सा
यूं ही अक्सर आ जाता है ?
क्या भूलें भटके कभी नाम मेरा
उसके होंटों पर भी आता है ?
इतने दिन उसको देखे बिना
जो हाल यहाँ पर मेरा है !
सच सच तू मुझको बतलाना
क्या हाल वहाँ पर उसका है ?
तुम रोज़ यहाँ जब आते हो
उसके घर भी हो कर आना
मेरी सब बातों का उत्तर
अपने चहरे पर लिख लाना !
मैं जीं भर के तुमको देखूँगी
समझूंगी उसको देख लिया
फिर पढ़ कर तेरे चहरे को
उसके दिल का हाल मैं पढ़ लूंगी !
कल शाम को तू जल्दी आना
बेचैन मेरे दिलको बतलाना
वो चांद वहाँ पर कैसा है ?
मुद्दत हो गयी देखे उसे
क्या हाल वहाँ पर उसका है ?
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Friday, October 5, 2007
ज़िन्दगी - एक सवाल
ये ज़िन्दगी क्या है ? एक अजीब सा सवाल है !
कैसे समझे और कैसे जिए कोई
सबका अपना - अपना ख्याल है !
किसी की नज़र में,ये सिर्फ एक जाम है !
किसी की निगाह में,ये गम की एक शाम है !
कोई कहता है,ये शायर का एक ख़्वाब है !
कोई समझे,ये मौत के ख़त का जवाब है !
कोई ढूढता है इसे छोटी छोटी खुशियों में
कोई महफ़िलों में इसे तलाशता है !
है बोझ पत्थर सा किसी के सीने पर
किसी की झोली में खिला गुलाब है !
कोई जीता है इसे दीये की तरह जल कर
कोई दिलों को जला कर दिन गुज़ारता है !
गुज़ारता है हर पल,कोई समझ कर नसीब इसे
कोई चुनौतिओं से लड़ कर नसीब बनता है !
पैगाम है कहीँ ये दर्द का ,
तो खुशियों की कहीँ ये झंकार है !
कैसे समझे और कैसे जिए कोई
सबका अपना,अपना ख्याल है !
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Tuesday, October 2, 2007
गुजारिश
ऐसा नहीं कि आज मुझे चांद चाहिऐ
मुझको तुम्हारे प्यार में विश्वास चाहिऐ !
न की कभी भी ख्वाहिश मैंने सितारों की
ख्वाबों में बस तुम्हारा मुझे दीदार चाहिऐ !
मिल न सको मुझे तुम हकीकत में ग़र कभी
जन्नत में बस तुम्हारा मुझे साथ चाहिऐ !
मायूस हो चुके हैं अब जिन्दगी से हम
अब चाहिऐ तो मौत का पैगाम चाहिऐ !
जाओगे दफन करने जब मेरे जिस्म को
बस आखिरी दो पल का मुझे साथ चाहिऐ !
ऐसा नही कि आज मुझे चांद चाहिऐ
मुझको तुम्हारे प्यार में विश्वास चाहिऐ !
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Sunday, September 30, 2007
पत्थर तो आख़िर पत्थर हैं
पत्थर की पूजा करते तो
अक्सर सबको देखा था !
पर पत्थर से करते प्यार
सिर्फ उसको ही देखा है !
कितनी अनजान है वो
नहीं जानती जो शायद
कि पत्थर दिल कब पिघले हैं !
हो जायेगी उम्र पूरी
करते हुए प्यार का इजहार
करते करते दिल की बात !
न पायेगी जब उत्तर उसका
टकरा कर थक-हार कर
बैठ जायेगी एकदम टूट कर !
नादाँ है नहीं जानती
पत्थर से मोहब्बत करना
आसमान पाने की चाह करना है !
और फिर बरसों बाद
उम्र का सफ़र तय करते करते
सामना हुआ जब एक दिन उस से
पूछा उसके दिल का हाल !
ठंडी सी एक आह भरकर
कह डाली उसने यह बात
उम्र भर का यही तकाजा
उम्र भर का यही एक सार
पत्थर की तुम पूजा कर लो
मत करना पत्थर से प्यार !
पत्थर तो अखिर पत्थर हैं
पत्थर दिल कब पिघले हैं !
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Saturday, September 29, 2007
वो कोई और
जिसको समझा था अपने सितारों का जहाँ
वो सितारों का जहाँ तो कोई और ही था !
जिसको सोचा था कभी अपना मैंने
वो ख्यालों का खुदा तो कोई और ही था !
क्यों चल दी थी पाने उस मंज़िल को
जिस मंज़िल का निशां कोई और ही था !
मैं लाई थी झोली में भर कर तारे
मेरे घर का सितारा तो कोई और ही था !
ये किसकी परछाई को मैंने अपना समझा
मेरी ज़िन्दगी का मसीहा तो कोई और ही था !
उम्र भर जिस चांद को देखा हमने
उस चन्दा का चकोर तो कोई और ही था !
सोचा था रुखसत होंगे तेरे कांधे पर
मेरी मय्यत को उठाने वाला तो कोई और ही था !
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Friday, September 28, 2007
उम्मीद का दीपक
अपनी उम्मीद का दीपक तुम जला कर रखना !
आस का दामन दिल में ही सजा कर रखना !
न जाने वक़्त कब करवट बदल ले
सोया सा एक आलम तुम जगा कर रखना !
न जाने कौन कब तेरे दर से गुज़रे
राहों पर नज़र अपनी बिछा कर रखना !
ये दिल का दर्द तो बढ़ता है हर पल
मगर दिल में इसे तुम दबा कर रखना !
छलकने जो लगें पलकों से मोती
इन अश्कों को पलकों में छुपा कर रखना !
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Thursday, September 27, 2007
मन की वेदना
बात कुछ ऐसे निकली
जैसे मुट्ठी से रेत !
ताश के पत्तों से गिर पडे
दिल के कुछ अरमान !
आंसू आंखों से यूं निकले
जैसे उमड़ पड़ा हो पानी
तोड़ कर कोई बाँध !
आह जो निकली मुँह से
जैसे जंगल की सर्द हवाएँ
सनसनाती जा रहीं हो
सीना चीर कर पेड़ों का !
ह्रदय में क्षोभ की ज्वाला
धधक रही है अग्नी सी !
कल के खिलखिलाते
मुस्कुराते,गुनगुनाते शब्द
आज वेदना में डूबे से हैं !
लगता है जैसे आज कुछ
अप्रत्याशित सा घट गया है !
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Thursday, September 27, 2007
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फरियाद
हर रोज़ रात का इंतज़ार करते हैं !
चांद निकलता है तो तुम्हें याद करते हैं !
दिल टूट ता है ,जब होती है अमावस
उस दिन तुम्हारा चेहरा देखने की फरियाद करते हैं !
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Thursday, September 27, 2007
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