फ़िर आसमान से सूरज उतरा
धरती पर लालिमा छाई !
पंछी उड़ चले नभ की ओर
मैंने भी घर की खिड़की खोली !
बाहर छोटी सी बगिया थी !
मंद,मंद हवा के झोंके
बुला रहे थे अपनी ओर !
अनायास मैं निकल पड़ी फ़िर
हरी घास थी जैसे मखमल
हर पौधे की हिलती डाली
लगता मुझको बुला रही थी !
जैसे मैं पहुँची एक पौधे के पास
देखा सुंदर खिला गुलाब !
सोने जैसा पीला रंग था !
देखा उसको,कुछ याद आया
एक पीला गुलाब वहां भी था
जो छोटा सा उपहार स्वरुप
किसी का आँगन महका रहा था !
न जाने अब कहाँ है वो ?
सजा रहा है उसका आँगन
या फ़िर सूख कर बिखर गया है ?
उसकी सुगंध में मेरी यादें
अब भी उसको आती होंगी ?
एक दिन उसने कहा था मुझसे
अब भी खुशबू आती है उसमें
अब भी वैसा ताजापन है !
रखूँगा इसको अपने दिल में
इसमें तेरा अपनापन है !
न जाने अब कहाँ है वो ?
सजा कर रखा है कोने में
या फ़िर तोड़ कर फैंक दिया है ?
तभी टहनी का काँटा चुभ कर
मुझे वर्तमान में ले आया !
और मैं लौट पड़ी फ़िर वापिस
भरी मन से घर की ओर !
दिल ने चाहा पंछी बनकर
उड़ कर पहुंचूं उसके पास !
और फ़िर उसका हाथ पकड़ कर
उससे पूछूं सिर्फ़ एक बात !
कहाँ है पीला खिला गुलाब ?
क्या अब भी है उसकी वैसी खुशबू ?
क्या अब भी उसमें वही महक है ?
क्या अब भी वैसा ताजापन है ?
क्या मेरी याद दिलाता है वो ?
फ़िर ढूंदेंगी उसको मेरी नज़रें
फ़िर पूछेंगी उससे यही सवाल !
यहाँ नहीं है,कहाँ गया वो ?
क्या तुमने वह फैंक दिया है ?
फैंक आए हो उसको पीछे
ऐसा मुझसे कभी न कहना !
वरना मैं समझूंगी तुमने
दिल से मुझको फैंक दिया है !
तभी नज़र पड़ेगी कोने पर
कागज़ में लिपटा खिला गुलाब
मानो मुझसे कहेगा हंस कर !
क्या सोचा था,तुम कर पाओगी
खुशबू को फूलों से दूर ?
दिल में उसके सदा रहोगी
चाहे हो जाओ जग से दूर !
Wednesday, October 8, 2008
वह पीला गुलाब
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Monday, September 8, 2008
कुछ सवालात
गुज़र चुकी जिंदगी की रातें
क्यूँ न सुबह का इंतज़ार करें !
बहुत हो चुकी तकरार की बातें
क्यूँ न प्यार का इज़हार करें !
मौत तो मिल जायेगी बिन मांगे
क्यूँ न जिंदगी से दो बात करें !
ढूंढ रहे हैं हम,कहाँ खो गए तुम
क्यूँ न हम तुमसे मुलाक़ात करें !
बहुत थक चुके,अब सोचते हैं हम
क्यूँ न तुमसे कुछ सवालात करें !
कहाँ से चले थे,कहाँ आ गए हम
क्यूँ न नए सफर की शुरुआत करें !
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Monday, August 18, 2008
तुम्हारा ख्याल
वो महकता हुआ सा तुम्हारा ख्याल
आज मुझे क्यूँ आ गया !
जागते में तुम्हारा सुनहरा सा ख्वाब
दिल को क्यूँ बहला गया !
वो महकता हुआ सा तुम्हारा ख्याल !!
तुम्हे तो भुला ही चुकी थी मैं कब का
अचानक तुम्हारा चेहरा
याद मुझे क्यूँ आ गया !
वो महकता हुआ सा तुम्हारा ख्याल !!
हवा से भी पूछा तुम्हारा हाल
फिजां से भी पूछा ये ही सवाल
मगर हर तरफ़ से मायूस सा
जवाब मुझे क्यूँ आ गया !
वो महकता हुआ सा तुम्हारा ख्याल !!
इस उम्मीद पर गुजरी मेरी शाम
कभी तो नज़र आए ईद का चाँद
मगर चाँद को देखते ही मुझे
तुम्हारा ख्याल आ गया !
वो महकता हुआ सा तुम्हारा ख्याल
आज मुझे क्यूँ आ गया !
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Thursday, August 7, 2008
प्यार भरा एक टुकडा
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Friday, August 1, 2008
दगा
दोस्त बन कर तुमने
अपनी ही दोस्ती को दगा दिया ,
तुमसे तो दुश्मन भले
जो दुश्मनी तो निभाते हैं !
गंगा की तरह पाक
समझा था तुम्हे हमने !
करके मैला दोस्ती को ,तुमने
गंगाजल को नापाक किया !
कहते थे बड़े नाज़ से हम
हीरा है दोस्ती अपनी !
कमबख्त तब कहाँ जानते थे
हीरा भी कभी ज़हर बन जाता है !
इसे वक्त का ही तकाजा कहें
जो कभी हम पर लुटाते थे अपनी जान !
आज वो हर हाल में
हमारी जान के दुश्मन बने जाते हैं !
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Wednesday, July 16, 2008
फ़ैसला
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Tuesday, July 8, 2008
इंतज़ार
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Tuesday, July 1, 2008
सौगात
ये ग़म किसी और ने दिए होते
तो शायद में भुला देती !
मगर मान कर ये सौगात तेरी
इन्हें दिल से लगाए बैठी हूँ !
वो दरीचे किसी और इमारत के होते
तो शायद --
नज़र झुका के चुपचाप चली जाती !
मगर आज उन्ही दरीचों को
नज़र भर देख के चली जाती हूँ !
रात ढलने को है और
नींद से बोझिल हैं पलकें मेरी !
सोचती हूँ ,क्यूँ तेरे ख्वाब आते हैं
और क्यूँ उन्हें पलकों में छुपा लेती हूँ !
प्यार भरे नगमे सुनती हूँ ,भुला देती हूँ !
हाँ ,तेरी बेवफाई के अफसाने
में अक्सर गुनगुनाती हूँ ,मुस्कुराती हूँ !
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Wednesday, June 25, 2008
रैन बसेरा
घर के पिछवाडे आया एक पंछी
बना गया खिड़की में रैन बसेरा
रख दिया उसमे मैंने फिर चुग्गा
बडे प्यार से उसने खाया
अपनी मीठी वाणी से फिर
उसने मेरा मन बहलाया
सारा दिन वह उड़ता फिरता
सांझ पड़े घर आया करता
में भी उसको सांझ सवेरे
उसके घर में देखा करती
पर पंछी तो पंछी ही हैं
कब रहता है एक ठिकाना
एक दिन ऐसा गया यहाँ से
आज तक न वापिस आया
घर के पिछवाडे उसी जगह पर
अब भी बना है वही बसेरा
में भी उसको न फ़ेंक सकी
रोज़ यही सोचा करती हूँ
शायद आज वह लौट आएगा
यही इंतज़ारमें रोज़ करती हूँ !
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Thursday, June 19, 2008
हैरान हूँ
हैरान हूँ , परेशान हूँ !
जिंदगी के दाव पेचों से ,
पूरी तरह अनजान हूँ !
क्या यही खेल हैं जिंदगी के ,
कि अपने अपनों को छलते रहें,
अपनेपन का दिखावा करते रहें !
और हम धिक्कारते रहें
उनको
गैर कह कर ,
जो गैर हो कर भी ,
जान हम पर लुटाते रहें !
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