Friday, April 27, 2012

हसरत

मैं इन पलकों को झुकाऊं कैसे
मैंने चाँद को धरती पर उतरते देखा है 
हाँ - वो रात का पहर था ,और थी तन्हाई 
सारी धरती लगती थी चांदनी में नहाई 
मैंने चांदनी में हीरे को लिपटे देखा है 
मेरी हसरत है कि चाँद को हाथों में पकड़ लूँ 
दिल के कोने में छुपा लूँ या पलकों में बसा लूँ 
मगर चाँद कब हो कर रहा है किसीका 
मैंने उसे मुंह फेर कर जाते देखा है ....  

Monday, April 23, 2012

फ़साना

कैसे कहूँ मैं तुमसे                    
अपने दिल का ये फ़साना 
एक चाहत का दायरा था 
वो भी सिमट रहा है 
न कोई वजूद मेरा 
न कोई मेरा ठिकाना 
लो अब चला मैं यारो 
मेरा सांस घुट रहा है 

Friday, May 27, 2011

इबादत न कर पाया

है याद तुमको देख कर 
नज़रों का झुका लेना 
मगर नज़रों की क़ैद से 
तुमको कभी 
रिहा न कर पाया मैं  !

किया था कभी वादा 
तुमसे मिलने का मेरे दोस्त 
मगर वादों की जंजीर से 
खुद को कभी 
जुदा न कर पाया मैं  !

सोचा था न करूंगा 
ताउम्र तुम्हें याद 
मगर यादों के बगीचे से 
खुद को कभी 
पार न कर पाया मैं  !

कबका बिछड़ा हुआ आज 
तेरे दर से जो गुज़रा
मगर चाहते हुए भी 
एक पल को तेरा 
दीदार न कर पाया मैं  !

है दुआ मेरी की सदा 
सलामत रहे तू 
मगर तेरे सिवा 
किसी और की कभी 
इबादत न कर पाया मैं  !  

Thursday, April 8, 2010

duaa

है आज दुआ बस मेरी इतनी
तू मेरे मन का मीत बने !
जो बदले न बरसों में
तू प्रेम की ऐसी रीत बने !
तेरे मुखसे जो शब्द निकलें
मेरे होटों के गीत बने !
हर आह्ट तेरी धड़कन की
मेरे दिलका संगीत बने !
हो जाय अमर इस दुनिया में
हम दोनों की ऐसी प्रीत बने !

Tuesday, September 22, 2009

ख्वाब


उनींदी सी आंखों में
पलकों के पीछे
ख़्वाबों में जब तुम
चुपके से आए !
मेरा मन महका
कदम डगमगाए
कानों में आकर
जब तुम गुनगुनाये !
इन्हीं चंद शब्दों को
सुनने की हसरत
हकीकत से हट कर
क्यूँ ख़्वाबों में लाये !
है तुमसे गुजारिश
यही बात कहने
हकीकत में आते
क्यूँ ख़्वाबों में आए !
ख़्वाबों से निकल कर
चले आओ दिल में
समय के सफर से
हैं दो पल चुराए !

Thursday, September 10, 2009

अहसास

मैंने देखा नहीं है उसको
मगर हवाओं में महसूस किया है !
है ख़्वाबों में तस्वीर उसकी
मैंने तस्वीरों में महसूस किया है !
वो मेरे अहसाह ,मेरी बातों में है
मैंने अल्फाजों में महसूस किया है !
समझा है,चाहा है,सोचा है उसको
शायद मैंने जज्बातों में महसूस किया है !

Wednesday, September 2, 2009

सुलझी पहेली

शायद मैंने तुम्हें कुछ समझा है !
बहुत कुछ नज़र आने पर ,
तुम्हारा नज़रंदाज़ कर जाना !
बहुत कुछ कहना चाहने पर ,
तुम्हारा इज़हार न कर पाना !
बहुत सी प्रेम भावनाओं का ,
तुम्हारे मन में दब जाना !
किसीकी इच्छाओं को जान कर ,
तुम्हारा अनजान बन जाना !
मगर -
खुली किताब सी आँखें तुम्हारी ,
बहुत कुछ पढ़ा देती हैं अब मुझको !
अनायास ही बंद ,चुप होंठ तुम्हारे ,
बहुत कुछ बता देते हैं अब मुझको !
प्रेम भावनाएं लिए चेहरा तुम्हारा ,
बहुत कुछ कह देता है अब मुझको !
मनमोहक,मनमुग्ध,मुस्कान तुम्हारी ,
बहुत कुछ दर्शाती हैं अब मुझको !
हाँ,तुम अनबूझ पहेली थे अब तक ,
वो पहेली सुलझी नज़र आती है अब मुझको !

Saturday, August 29, 2009

एक शाम के नाम

सूरज का रथ लालिमा ले कर ,
निकल पड़ा था क्षितिज की ओर !
विशाल समुद्र के सपाट हृदय पर ,
उठ रहा था लहरों का शोर !
कलरव करते पक्षी भी अब,
ढूंढ रहे थे रैन बसेरा !
वहीँ दूर एक खड़ी थी किश्ती ,
जाने को अब घर की ओर !
सफ़ेद चमकती रेत पर बैठी ,
सोच रही थी मैं एक बात !
क्यूँ न आज कुछ पंक्तियाँ लिख कर ,
कर दोन उनको इस शाम के नाम !
मेरे जीवन की जब भी आए ,
ऐसी शाम सुहानी हो !
जो बीती ,जैसी भी बीती ,
आगे सुख भरी कहानी हो !
जब भी आए डोली मेरी ,
इस दुनिया से दूर जाने को !
विदा करना तुम मुझे सजा कर ,
जैसे दुल्हन नई नवेली हो !

Tuesday, August 18, 2009

जीवन यात्रा

जीवन एक यात्रा है ,जो शुरू होती है
बचपन की खुली ,चौडी ,साफ़ सडकों से !
जिनसे बचपन भागता सा गुज़र जाता है !
फ़िर नज़र आती हैं वही सड़कें
गली के रूप में !
जहाँ धीमी हो जाती है जीवन की रफ़्तार !
कुछ समय बाद शुरू होती हैं
पग डंडियाँ - छोटी ,बड़ी,लम्बी,पतली
यहीं से शुरू होता है ,आँख मिचोली का खेल !
जो इन पग डंडियों में भटक गया,
वही जीवनधारा में उलझ गया !
जिसने अपना रास्ता खोज लिया
समझो वही जीवन में जीत गया !
मैं भी भटक गई हूँ इन पग डंडियों में !
वहाँ आ खड़ी हूँ ,जहाँ से हर रास्ता
अंधेरे में खोया सा लगता है !
भटकने के डर से भयभीत
और सही मार्गदर्शन की उम्मीद ले खड़ी हूँ !
यात्रा का अंत कब और कहाँ होगा
मैं नहीं जानती !
मगर इतना जानती हूँ
कि---
जीवन यात्रा बहुत छोटी है !

Saturday, June 6, 2009

अपने शहर में

नसीब-ए-दर्द किसीसे ,हम कहना नहीं चाहते
अब अपने शहर में दिल-ए-सोज़ ,हम रहना नहीं चाहते !

हमने देखी है वफ़ा की आड़ में,बेवफाई उनकी
इस अफसाने को अब ,हम कहना नहीं चाहते
अब अपने शहर में दिल-ए-सोज़ ,हम रहना नहीं चाहते !

न समझें जज़्बात वो हमारे ,तो कोई बात नहीं
यूँ बेवजह हम भी ,उन्हें समझाना नहीं चाहते
अब अपने शहर में दिल-ए-सोज़ ,हम रहना नहीं चाहते !

भरते थे दम वो सरे महफ़िल ,जाँ निसारी का
ज़ख्म-ए-जिगर उनके दिए ,हम दिखाना नहीं चाहते
अब अपने शहर में दिल-ए-सोज़ ,हम रहना नहीं चाहते !